श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.31.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

यथैव सूर्यात्प्रभवन्ति वारः

पुनश्‍च तस्मिन् प्रविशन्ति काले।

भूतानि भूमौ स्थिरजंगमानि

तथा हरावेव गुणप्रवाहः॥ १५

yathaiva sūryātprabhavanti vāraḥ

punaśca tasmin praviśanti kāle|

bhūtāni bhūmau sthirajaṃgamāni

tathā harāveva guṇapravāhaḥ|| 15

अर्थ

जिस प्रकार वर्षाकालमें जल सूर्यके तापसे उत्पन्‍न होता है और ग्रीष्म-ऋतुमें उसीकी किरणोंमें पुनः प्रवेश कर जाता है तथा जैसे समस्त चराचर भूत पृथ्वीसे उत्पन्‍न होते हैं और फिर उसीमें मिल जाते हैं, उसी प्रकार चेतना-चेतनात्मक यह समस्त प्रपंच श्रीहरिसे ही उत्पन्‍न होता है और उन्हींमें लीन हो जाता है॥ १५॥✎ 427

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #427 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्‌की

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