श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.45

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

ततोऽग्‍निमारुतौ राजन्‍नमुञ्चन्मुखतो रुषा।

महीं निर्वीरुधं कर्तुं संवर्तक इवात्यये॥ ४५

tato'gnimārutau rājannamuñcanmukhato ruṣā|

mahīṃ nirvīrudhaṃ kartuṃ saṃvartaka ivātyaye|| 45

अर्थ

तब उन्होंने पृथ्वीको वृक्ष, लता आदिसे रहित कर देनेके लिये अपने मुखसे प्रचण्ड वायु और अग्‍निको छोड़ा, जैसे कालाग्‍निरुद्र प्रलयकालमें छोड़ते हैं॥ ४५॥✎ 424 425 1349

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #424 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #425 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1349 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीहरि-की → श्रीहरिकी

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