श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.35

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

यत्रेड्यन्ते कथा मृष्टास्तृष्णायाः प्रशमो यतः।

निर्वैरं यत्र भूतेषु नोद्वेगो यत्र कश्‍चन॥ ३५

yatreḍyante kathā mṛṣṭāstṛṣṇāyāḥ praśamo yataḥ|

nirvairaṃ yatra bhūteṣu nodvego yatra kaścana|| 35

अर्थ

भगवद्भक्तोंके समाजमें सदा-सर्वदा भगवान्‌की मधुर-मधुर कथाएँ होती रहती हैं, जिनके श्रवणमात्रसे भोगतृष्णा शान्त हो जाती है। वहाँ प्राणियोंमें किसी प्रकारका वैर-विरोध या उद्वेग नहीं रहता ॥ ३५॥✎ 423 1348

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #423 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1348 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निष्काम-भावसे → निष्कामभावसे

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