श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्।

भगवत्संगिसंगस्य मर्त्यानां किमुताशिषः॥ ३४

tulayāma lavenāpi na svargaṃ nāpunarbhavam|

bhagavatsaṃgisaṃgasya martyānāṃ kimutāśiṣaḥ|| 34

अर्थ

हम तो भगवद्भक्तोंके क्षणभरके संगके सामने स्वर्ग और मोक्षको भी कुछ नहीं समझते; फिर मानवी भोगोंकी तो बात ही क्या है॥ ३४॥✎ 423 1348

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #423 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1348 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निष्काम-भावसे → निष्कामभावसे

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