श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.32

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

पारिजातेऽञ्जसा लब्धे सारंगोऽन्यन्‍न सेवते।

त्वदङ्‌घ्रिमूलमासाद्य साक्षात्किं किं वृणीमहि॥ ३२

pārijāte'ñjasā labdhe sāraṃgo'nyanna sevate|

tvadaṅghrimūlamāsādya sākṣātkiṃ kiṃ vṛṇīmahi|| 32

अर्थ

यदि भ्रमरको अनायास ही कल्पवृक्ष मिल जाय, तो क्या वह किसी दूसरे वृक्षका सेवन करेगा? तब आपकी चरणशरणमें आकर अब हम क्या-क्या माँगें॥ ३२॥✎ 423 1348

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #423 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1348 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निष्काम-भावसे → निष्कामभावसे

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें