यदि भ्रमरको अनायास ही कल्पवृक्ष मिल जाय, तो क्या वह किसी दूसरे वृक्षका सेवन करेगा? तब आपकी चरणशरणमें आकर अब हम क्या-क्या माँगें॥ ३२॥✎ 4231348
पारिजातेऽञ्जसा लब्धे सारंगोऽन्यन्न सेवते।
त्वदङ्घ्रिमूलमासाद्य साक्षात्किं किं वृणीमहि॥ ३२
यदि भ्रमरको अनायास ही कल्पवृक्ष मिल जाय, तो क्या वह किसी दूसरे वृक्षका सेवन करेगा? तब आपकी चरणशरणमें आकर अब हम क्या-क्या माँगें॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 568) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)