तथापि, नाथ! हम एक वर आपसे अवश्य माँगते हैं। प्रभो! आप प्रकृति आदिसे परे हैं और आपकी विभूतियोंका भी कोई अन्त नहीं है; इसलिये आप ‘अनन्त’ कहे जाते हैं॥ ३१॥
वरं वृणीमहेऽथापि नाथ त्वत्परतः परात्।
न ह्यन्तस्त्वद्विभूतीनां सोऽनन्त इति गीयसे॥ ३१
तथापि, नाथ! हम एक वर आपसे अवश्य माँगते हैं। प्रभो! आप प्रकृति आदिसे परे हैं और आपकी विभूतियोंका भी कोई अन्त नहीं है; इसलिये आप ‘अनन्त’ कहे जाते हैं॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 567) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/31/