अमंगलहारी प्रभो! दीनोंपर दया करनेवाले समर्थ पुरुषोंको इतनी ही कृपा करनी चाहिये कि समय-समयपर उन दीनजनोंको ‘ये हमारे हैं’ इस प्रकार स्मरण कर लिया करें॥ २८॥
एतावत्त्वं हि विभुभिर्भाव्यं दीनेषु वत्सलैः।
यदनुस्मर्यते काले स्वबुद्ध्याभद्ररन्धन॥ २८
अमंगलहारी प्रभो! दीनोंपर दया करनेवाले समर्थ पुरुषोंको इतनी ही कृपा करनी चाहिये कि समय-समयपर उन दीनजनोंको ‘ये हमारे हैं’ इस प्रकार स्मरण कर लिया करें॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.30.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 567) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/30/28/