श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.29

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

येनोपशान्तिर्भूतानां क्षुल्लकानामपीहताम्।

अन्तर्हितोऽन्तर्हृदये कस्मान्‍नो वेद नाशिषः॥ २९

yenopaśāntirbhūtānāṃ kṣullakānāmapīhatām|

antarhito'ntarhṛdaye kasmānno veda nāśiṣaḥ|| 29

अर्थ

इसीसे उनके आश्रितोंका चित्त शान्त हो जाता है। आप तो क्षुद्र-से-क्षुद्र प्राणियोंके भी अन्तःकरणोंमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान रहते हैं। फिर आपके उपासक हमलोग जो-जो कामनाएँ करते हैं, हमारी उन कामनाओंको आप क्यों न जान लेंगे॥ २९॥

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