श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.30.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

रूपं भगवता त्वेतदशेषक्लेशसंक्षयम्।

आविष्कृतं नः क्लिष्टानां किमन्यदनुकम्पितम्॥ २७

rūpaṃ bhagavatā tvetadaśeṣakleśasaṃkṣayam|

āviṣkṛtaṃ naḥ kliṣṭānāṃ kimanyadanukampitam|| 27

अर्थ

भगवन्! आपका यह स्वरूप सम्पूर्ण क्लेशोंकी निवृत्ति करनेवाला है; हम अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेषादि क्लेशोंसे पीड़ितोंके सामने आपने इसे प्रकट किया है। इससे बढ़कर हमपर और क्या कृपा होगी॥ २७॥

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