श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

नारद उवाच

पुरुषं पुरंजनं विद्याद्यद् व्यनक्‍त्यात्मनः पुरम्।

एकद्वित्रिचतुष्पादं बहुपादमपादकम्॥ २

puruṣaṃ puraṃjanaṃ vidyādyad vyanaktyātmanaḥ puram|

ekadvitricatuṣpādaṃ bahupādamapādakam|| 2

अर्थ

श्रीनारदजीने कहा—राजन्! पुरंजन (नगरका निर्माता) जीव है—जो अपने लिये एक, दो, तीन, चार अथवा बहुत पैरोंवाला या बिना पैरोंका शरीररूप पुर तैयार कर लेता है॥ २॥✎ 1342

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1342 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वृत्तियों-वाला → वृत्तियोंवाला

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