श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.16

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अन्तःपुरं च हृदयं विषूचिर्मन उच्यते।

तत्र मोहं प्रसादं वा हर्षं प्राप्नोति तद‍्गुणैः॥ १६

antaḥpuraṃ ca hṛdayaṃ viṣūcirmana ucyate|

tatra mohaṃ prasādaṃ vā harṣaṃ prāpnoti tadguṇaiḥ|| 16

अर्थ

हृदय अन्तःपुर है, उसमें रहनेवाला मन ही विषूचि (विषूचीन) नामका प्रधान सेवक है। जीव उस मनके सत्त्वादि गुणोंके कारण ही प्रसन्‍नता, हर्षरूप विकार अथवा मोहको प्राप्त होता है॥ १६॥✎ 1343 1344

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1343 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1344 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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