बुद्धि (राजमहिषी पुरंजनी) जिस-जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें विकारको प्राप्त होती है और जाग्रत्-अवस्थामें इन्द्रियादिको विकृत करती है, उसके गुणोंसे लिप्त होकर आत्मा (जीव) भी उसी-उसी रूपमें उसकी वृत्तियोंका अनुकरण करनेको बाध्य होता है—यद्यपि वस्तुतः वह उनका निर्विकार साक्षीमात्र ही है॥ १७॥
यथा यथा विक्रियते गुणाक्तो विकरोति वा।
तथा तथोपद्रष्टाऽऽत्मा तद्वृत्तीरनुकार्यते॥ १७
बुद्धि (राजमहिषी पुरंजनी) जिस-जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें विकारको प्राप्त होती है और जाग्रत्-अवस्थामें इन्द्रियादिको विकृत करती है, उसके गुणोंसे लिप्त होकर आत्मा (जीव) भी उसी-उसी रूपमें उसकी वृत्तियोंका अनुकरण करनेको बाध्य होता है—यद्यपि वस्तुतः वह उनका निर्विकार साक्षीमात्र ही है॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.29.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 555) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/29/17/