श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यथा यथा विक्रियते गुणाक्तो विकरोति वा।

तथा तथोपद्रष्टाऽऽत्मा तद‍्वृत्तीरनुकार्यते॥ १७

yathā yathā vikriyate guṇākto vikaroti vā|

tathā tathopadraṣṭā''tmā tadvṛttīranukāryate|| 17

अर्थ

बुद्धि (राजमहिषी पुरंजनी) जिस-जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें विकारको प्राप्त होती है और जाग्रत्-अवस्थामें इन्द्रियादिको विकृत करती है, उसके गुणोंसे लिप्त होकर आत्मा (जीव) भी उसी-उसी रूपमें उसकी वृत्तियोंका अनुकरण करनेको बाध्य होता है—यद्यपि वस्तुतः वह उनका निर्विकार साक्षीमात्र ही है॥ १७॥

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