श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.13

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

प्रवृत्तं च निवृत्तं च शास्त्रं पंचालसंज्ञितम्।

पितृयानं देवयानं श्रोत्राच्छ्रुतधराद्व्रजेत्॥ १३

pravṛttaṃ ca nivṛttaṃ ca śāstraṃ paṃcālasaṃjñitam|

pitṛyānaṃ devayānaṃ śrotrācchrutadharādvrajet|| 13

अर्थ

कर्मकाण्डरूप प्रवृत्तिमार्गका शास्त्र और उपासनाकाण्डरूप निवृत्तिमार्गका शास्त्र ही क्रमशः दक्षिण और उत्तर पांचाल देश हैं। इन्हें श्रवणेन्द्रियरूप श्रुतधरकी सहायतासे सुनकर जीव क्रमशः पितृयान और देवयान मार्गोंमें जाता है॥ १३॥✎ 1343 1344

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1343 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1344 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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