श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.29.12

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

आपणो व्यवहारोऽत्र चित्रमन्धो बहूदनम्।

पितृहूर्दक्षिणः कर्ण उत्तरो देवहूः स्मृतः॥ १२

āpaṇo vyavahāro'tra citramandho bahūdanam|

pitṛhūrdakṣiṇaḥ karṇa uttaro devahūḥ smṛtaḥ|| 12

अर्थ

वाणीका व्यापार आपण है और तरह-तरहका अन्‍न बहूदन है तथा दाहिना कान पितृहू और बायाँ कान देवहू कहा गया है॥ १२॥✎ 1343 1344

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1343 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति → निऋर्ऋति
  • #1344 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति → निर्ऋति

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