श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.20

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

प्रबोधयति माविज्ञं व्युषिते शोककर्शिता।

वर्त्मैतद् गृहमेधीयं वीरसूरपि२ नेष्यति॥ २०

prabodhayati māvijñaṃ vyuṣite śokakarśitā|

vartmaitad gṛhamedhīyaṃ vīrasūrapi neṣyati|| 20

अर्थ

मुझसे कोई भूल हो जाती तो यह मुझे सचेत कर देती थी। मुझमें इसका इतना अधिक स्नेह है कि यदि मैं कभी परदेश चला जाता था तो यह विरहव्यथासे सूखकर काँटा हो जाती थी। यों तो यह वीरमाता है, तो भी मेरे पीछे क्या यह गृहस्थाश्रमका व्यवहार चला सकेगी?॥ २०॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—रभिनेष्यति।

    (मुद्रित पृष्ठ 548)

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