श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

कथं नु दारका दीना दारकीर्वापरायणाः।

वर्तिष्यन्ते मयि गते३ भिन्‍ननाव इवोदधौ॥ २१

kathaṃ nu dārakā dīnā dārakīrvāparāyaṇāḥ|

vartiṣyante mayi gate bhinnanāva ivodadhau|| 21

अर्थ

मेरे चले जानेपर एकमात्र मेरे ही सहारे रहनेवाले ये पुत्र और पुत्री भी कैसे जीवन धारण करेंगे? ये तो बीच समुद्रमें नाव टूट जानेसे व्याकुल हुए यात्रियोंके समान बिलबिलाने लगेंगे’॥ २१॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—मृते।

    (मुद्रित पृष्ठ 548)

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