मेरे चले जानेपर एकमात्र मेरे ही सहारे रहनेवाले ये पुत्र और पुत्री भी कैसे जीवन धारण करेंगे? ये तो बीच समुद्रमें नाव टूट जानेसे व्याकुल हुए यात्रियोंके समान बिलबिलाने लगेंगे’॥ २१॥
कथं नु दारका दीना दारकीर्वापरायणाः।
वर्तिष्यन्ते मयि गते भिन्ननाव इवोदधौ॥ २१
मेरे चले जानेपर एकमात्र मेरे ही सहारे रहनेवाले ये पुत्र और पुत्री भी कैसे जीवन धारण करेंगे? ये तो बीच समुद्रमें नाव टूट जानेसे व्याकुल हुए यात्रियोंके समान बिलबिलाने लगेंगे’॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 548) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/21/