श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.19

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

न मय्यनाशिते भुङ्क्ते नास्नाते स्नाति मत्परा।

मयि रुष्टे सुसंत्रस्ता१ भर्त्सिते यतवाग्भयात्॥ १९

na mayyanāśite bhuṅkte nāsnāte snāti matparā|

mayi ruṣṭe susaṃtrastā bhartsite yatavāgbhayāt|| 19

अर्थ

यह मेरे भोजन किये बिना भोजन नहीं करती थी और स्नान किये बिना स्नान नहीं करती थी, सदा मेरी ही सेवामें तत्पर रहती थी। मैं कभी रूठ जाता था तो यह बड़ी भयभीत हो जाती थी और झिड़कने लगता तो डरके मारे चुप रह जाती थी॥ १९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—तु संत्र०।

    (मुद्रित पृष्ठ 548)

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