यह मेरे भोजन किये बिना भोजन नहीं करती थी और स्नान किये बिना स्नान नहीं करती थी, सदा मेरी ही सेवामें तत्पर रहती थी। मैं कभी रूठ जाता था तो यह बड़ी भयभीत हो जाती थी और झिड़कने लगता तो डरके मारे चुप रह जाती थी॥ १९॥
न मय्यनाशिते भुङ्क्ते नास्नाते स्नाति मत्परा।
मयि रुष्टे सुसंत्रस्ता भर्त्सिते यतवाग्भयात्॥ १९
यह मेरे भोजन किये बिना भोजन नहीं करती थी और स्नान किये बिना स्नान नहीं करती थी, सदा मेरी ही सेवामें तत्पर रहती थी। मैं कभी रूठ जाता था तो यह बड़ी भयभीत हो जाती थी और झिड़कने लगता तो डरके मारे चुप रह जाती थी॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 548) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/19/