श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.28.14

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

न शेके सोऽवितुं तत्र पुरुकृच्छ्रोरुवेपथुः।

गन्तुमैच्छत्ततो वृक्षकोटरादिव सानलात्॥ १४

na śeke so'vituṃ tatra purukṛcchroruvepathuḥ|

gantumaicchattato vṛkṣakoṭarādiva sānalāt|| 14

अर्थ

जब उस नगरकी रक्षा करनेमें वह सर्वथा असमर्थ हो गया, तब जिस प्रकार जलते हुए वृक्षके कोटरमें रहनेवाला सर्प उससे निकल जाना चाहता है, उसी प्रकार उसने भी महान् कष्टसे काँपते हुए वहाँसे भागनेकी इच्छा की॥ १४॥

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