उसके अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ गये थे तथा गन्धर्वोंने उसकी सारी शक्ति नष्ट कर दी थी; अतः जब यवन शत्रुओंने उसे जाते देखकर रोक दिया, तब वह दुःखी होकर रोने लगा॥ १५॥
शिथिलावयवो यर्हि गन्धर्वैर्हृतपौरुषः।
यवनैररिभी राजन्नुपरुद्धो रुरोद ह॥ १५
उसके अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ गये थे तथा गन्धर्वोंने उसकी सारी शक्ति नष्ट कर दी थी; अतः जब यवन शत्रुओंने उसे जाते देखकर रोक दिया, तब वह दुःखी होकर रोने लगा॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 547) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/28/15/