नगरको कालकन्याके हाथमें पड़ा देख उसकी रक्षा करनेवाले सर्पको भी बड़ी पीड़ा हुई, क्योंकि उसके निवासस्थानपर भी यवनोंने अधिकार कर लिया था और प्रज्वार उसपर भी आक्रमण कर रहा था॥ १३॥
यवनोपरुद्धायतनो ग्रस्तायां कालकन्यया।
पुर्यां प्रज्वारसंसृष्टः पुरपालोऽन्वतप्यत॥ १३
नगरको कालकन्याके हाथमें पड़ा देख उसकी रक्षा करनेवाले सर्पको भी बड़ी पीड़ा हुई, क्योंकि उसके निवासस्थानपर भी यवनोंने अधिकार कर लिया था और प्रज्वार उसपर भी आक्रमण कर रहा था॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.28.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 547) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/28/13/