श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.27.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

द्वाविमावनुशोचन्ति बालावसदवग्रहौ।

यल्लोकशास्त्रोपनतं न राति न तदिच्छति॥ २५

dvāvimāvanuśocanti bālāvasadavagrahau|

yallokaśāstropanataṃ na rāti na tadicchati|| 25

अर्थ

जो मनुष्य लोक अथवा शास्त्रकी दृष्टिसे देनेयोग्य वस्तुका दान नहीं करता और जो शास्त्रदृष्टिसे अधिकारी होकर भी ऐसा दान नहीं लेता, वे दोनों ही दुराग्रही और मूढ़ हैं, अतएव शोचनीय हैं॥ २५॥

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