श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.27.12

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

युक्तेष्वेवं प्रमत्तस्य कुटुम्बासक्तचेतसः।

आससाद१ स वै कालो योऽप्रियः प्रिययोषिताम्॥ १२

yukteṣvevaṃ pramattasya kuṭumbāsaktacetasaḥ|

āsasāda sa vai kālo yo'priyaḥ priyayoṣitām|| 12

अर्थ

इस प्रकार वह जीवनभर आत्माका कल्याण करनेवाले कर्मोंकी ओरसे असावधान और कुटुम्बपालनमें व्यस्त रहा। अन्तमें वृद्धावस्थाका वह समय आ पहुँचा, जो स्त्रीलंपट पुरुषोंको बड़ा अप्रिय होता है॥ १२॥✎ 1340

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—आससादाथ वै।

    (मुद्रित पृष्ठ 544)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1340 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): १२ → १२॥

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