श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

एते त्वां सम्प्रतीक्षन्ते स्मरन्तो वैशसं तव।

सम्परेतमयःकूटैश्छिन्दन्त्युत्थितमन्यवः ॥ ८

ete tvāṃ sampratīkṣante smaranto vaiśasaṃ tava|

samparetamayaḥkūṭaiśchindantyutthitamanyavaḥ || 8

अर्थ

ये सब तुम्हारे द्वारा प्राप्त हुई पीड़ाओंको याद करते हुए बदला लेनेके लिये तुम्हारी बाट देख रहे हैं। जब तुम मरकर परलोकमें जाओगे, तब ये अत्यन्त क्रोधमें भरकर तुम्हें अपने लोहेके-से सींगोंसे छेदेंगे॥ ८॥

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