श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार भगवान् शंकरने प्रचेताओंको उपदेश दिया। फिर प्रचेताओंने शंकरजीकी बड़े भक्तिभावसे पूजा की। इसके पश्चात् वे उन राजकुमारोंके सामने ही अन्तर्धान हो गये॥ १॥✎ 417
इति सन्दिश्य भगवान् बार्हिषदैरभिपूजितः।
पश्यतां राजपुत्राणां तत्रैवान्तर्दधे हरः॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार भगवान् शंकरने प्रचेताओंको उपदेश दिया। फिर प्रचेताओंने शंकरजीकी बड़े भक्तिभावसे पूजा की। इसके पश्चात् वे उन राजकुमारोंके सामने ही अन्तर्धान हो गये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.25.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 533) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/25/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#417 शब्दोंके बीचका स्थान: प्रकारभगवान् → प्रकार भगवान्