श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.25.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

पुरंजनोपाख्यानका प्रारम्भ

मैत्रेय उवाच

इति सन्दिश्य भगवान् बार्हिषदैरभिपूजितः।

पश्यतां राजपुत्राणां तत्रैवान्तर्दधे हरः॥ १

iti sandiśya bhagavān bārhiṣadairabhipūjitaḥ|

paśyatāṃ rājaputrāṇāṃ tatraivāntardadhe haraḥ|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! इस प्रकार भगवान् शंकरने प्रचेताओंको उपदेश दिया। फिर प्रचेताओंने शंकरजीकी बड़े भक्तिभावसे पूजा की। इसके पश्चात् वे उन राजकुमारोंके सामने ही अन्तर्धान हो गये॥ १॥✎ 417

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #417 शब्दोंके बीचका स्थान: प्रकारभगवान् → प्रकार भगवान्

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