राजकुमारो! मैंने तुम्हें जो यह परमपुरुष परमात्माका स्तोत्र सुनाया है, इसे एकाग्रचित्तसे जपते हुए तुम महान् तपस्या करो। तपस्या पूर्ण होनेपर इसीसे तुम्हें अभीष्ट फल प्राप्त हो जायगा॥ ७९॥✎ 416
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे रुद्रगीतं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
गीतं मयेदं नरदेवनन्दनाः
परस्य पुंसः परमात्मनः स्तवम्।
जपन्त एकाग्रधियस्तपो मह-
च्चरध्वमन्ते तत आप्स्यथेप्सितम्॥ ७९
राजकुमारो! मैंने तुम्हें जो यह परमपुरुष परमात्माका स्तोत्र सुनाया है, इसे एकाग्रचित्तसे जपते हुए तुम महान् तपस्या करो। तपस्या पूर्ण होनेपर इसीसे तुम्हें अभीष्ट फल प्राप्त हो जायगा॥ ७९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.79 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 533) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/24/79/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)