॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.24.61
यो माययेदं पुरुरूपयासृजद्
बिभर्ति भूयः क्षपयत्यविक्रियः।
यद्भेदबुद्धिः सदिवात्मदुःस्थया
तमात्मतन्त्रं भगवन् प्रतीमहि॥ ६१
yo māyayedaṃ pururūpayāsṛjad
bibharti bhūyaḥ kṣapayatyavikriyaḥ|
yadbhedabuddhiḥ sadivātmaduḥsthayā
tamātmatantraṃ bhagavan pratīmahi|| 61
अर्थ
भगवन्! आपकी माया अनेक प्रकारके रूप धारण करती है। इसीके द्वारा आप इस प्रकार जगत्की रचना, पालन और संहार करते हैं जैसे यह कोई सद्वस्तु हो। किन्तु इससे आपमें किसी प्रकारका विकार नहीं आता। मायाके कारण दूसरे लोगोंमें ही भेदबुद्धि उत्पन्न होती है, आप परमात्मापर वह अपना प्रभाव डालनेमें असमर्थ होती है। आपको तो हम परम स्वतन्त्र ही समझते हैं॥ ६१॥