श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.62

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

क्रियाकलापैरिदमेव योगिनः

श्रद्धान्विताः साधु यजन्ति सिद्धये।

भूतेन्द्रियान्तःकरणोपलक्षितं

वेदे च तन्त्रे च त एव कोविदाः॥ ६२

kriyākalāpairidameva yoginaḥ

śraddhānvitāḥ sādhu yajanti siddhaye|

bhūtendriyāntaḥkaraṇopalakṣitaṃ

vede ca tantre ca ta eva kovidāḥ|| 62

अर्थ

आपका स्वरूप पंचभूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणके प्रेरकरूपसे उपलक्षित होता है। जो कर्मयोगी पुरुष सिद्धि प्राप्त करनेके लिये तरह-तरहके कर्मोंद्वारा आपके इस सगुण साकार स्वरूपका श्रद्धापूर्वक भलीभाँति पूजन करते हैं, वे ही वेद और शास्त्रोंके सच्चे मर्मज्ञ हैं॥ ६२॥

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