श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.24.60

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

यत्रेदं व्यज्यते विश्‍वं विश्‍वस्मिन्‍नवभाति यत्।

तत् त्वं ब्रह्म परं ज्योतिराकाशमिव२ विस्तृतम्३॥ ६०

yatredaṃ vyajyate viśvaṃ viśvasminnavabhāti yat|

tat tvaṃ brahma paraṃ jyotirākāśamiva vistṛtam|| 60

अर्थ

जिसमें यह सारा जगत् दिखायी देता है और जो स्वयं सम्पूर्ण जगत‍्में भास रहा है, वह आकाशके समान विस्तृत और परम प्रकाशमय ब्रह्मतत्त्व आप ही हैं॥ ६०॥✎ 414

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—राकाश इव।

    (मुद्रित पृष्ठ 530)
  2. ३

    प्रा० पा०—विस्तृतः।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 530)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #414 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें