इस क्रमसे उनकी तपस्या बहुत पुष्ट हो गयी और उसके प्रभावसे कर्ममल नष्ट हो जानेके कारण उनका चित्त सर्वथा शुद्ध हो गया। प्राणायामोंके द्वारा मन और इन्द्रियोंके निरुद्ध हो जानेसे उनका वासनाजनित बन्धन भी कट गया॥ ८॥
तेन क्रमानुसिद्धेन ध्वस्तकर्मामलाशयः।
प्राणायामैः संनिरुद्धषड्वर्गश्छिन्नबन्धनः॥ ८
इस क्रमसे उनकी तपस्या बहुत पुष्ट हो गयी और उसके प्रभावसे कर्ममल नष्ट हो जानेके कारण उनका चित्त सर्वथा शुद्ध हो गया। प्राणायामोंके द्वारा मन और इन्द्रियोंके निरुद्ध हो जानेसे उनका वासनाजनित बन्धन भी कट गया॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.23.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 520) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/23/8/