श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.7

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तितिक्षुर्यतवाग्दान्त ऊर्ध्वरेता जितानिलः।

आरिराधयिषुः कृष्णमचरत्तप उत्तमम्॥ ७

titikṣuryatavāgdānta ūrdhvaretā jitānilaḥ|

ārirādhayiṣuḥ kṛṣṇamacarattapa uttamam|| 7

अर्थ

उन्होंने शीतोष्णादि सब प्रकारके द्वन्द्वोंको सहा तथा वाणी और मनका संयम करके ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए प्राणोंको अपने अधीन किया। इस प्रकार श्रीकृष्णकी आराधना करनेके लिये उन्होंने उत्तम तप किया॥ ७॥

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