उन्होंने शीतोष्णादि सब प्रकारके द्वन्द्वोंको सहा तथा वाणी और मनका संयम करके ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए प्राणोंको अपने अधीन किया। इस प्रकार श्रीकृष्णकी आराधना करनेके लिये उन्होंने उत्तम तप किया॥ ७॥
तितिक्षुर्यतवाग्दान्त ऊर्ध्वरेता जितानिलः।
आरिराधयिषुः कृष्णमचरत्तप उत्तमम्॥ ७
उन्होंने शीतोष्णादि सब प्रकारके द्वन्द्वोंको सहा तथा वाणी और मनका संयम करके ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए प्राणोंको अपने अधीन किया। इस प्रकार श्रीकृष्णकी आराधना करनेके लिये उन्होंने उत्तम तप किया॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.23.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 520) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/23/7/