श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

स वंचितो बतात्मध्रुक् कृच्छ्रेण महता भुवि।

लब्ध्वापवर्ग्यं मानुष्यं विषयेषु विषज्जते॥ २८

sa vaṃcito batātmadhruk kṛcchreṇa mahatā bhuvi|

labdhvāpavargyaṃ mānuṣyaṃ viṣayeṣu viṣajjate|| 28

अर्थ

अतः जो पुरुष बड़ी कठिनतासे भूलोकमें मोक्षका साधनस्वरूप मनुष्य-शरीर पाकर भी विषयोंमें आसक्त रहता है, वह निश्‍चय ही आत्मघाती है; हाय! हाय! वह ठगा गया॥ २८॥

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