श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! जिस समय देवांगनाएँ इस प्रकार स्तुति कर रही थीं, भगवान्के जिस परमधामको आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवत्प्राण महाराज पृथु गये, महारानी अर्चि भी उसी पतिलोकको गयीं॥ २९॥
स्तुवतीष्वमरस्त्रीषु पतिलोकं गता वधूः।
यं वा आत्मविदां धुर्यो वैन्यः प्रापाच्युताशयः॥ २९
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! जिस समय देवांगनाएँ इस प्रकार स्तुति कर रही थीं, भगवान्के जिस परमधामको आत्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भगवत्प्राण महाराज पृथु गये, महारानी अर्चि भी उसी पतिलोकको गयीं॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.23.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 522) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/23/29/