श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.27

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तेषां दुरापं किं त्वन्यन्मर्त्यानां भगवत्पदम्।

भुवि लोलायुषो ये वै नैष्कर्म्यं साधयन्त्युत॥ २७

teṣāṃ durāpaṃ kiṃ tvanyanmartyānāṃ bhagavatpadam|

bhuvi lolāyuṣo ye vai naiṣkarmyaṃ sādhayantyuta|| 27

अर्थ

इस लोकमें कुछ ही दिनोंका जीवन होनेपर भी जो लोग भगवान्‌के परमपदकी प्राप्ति करानेवाला आत्मज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, उनके लिये संसारमें कौन पदार्थ दुर्लभ है॥ २७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें