॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.23.16
खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागशः।
क्षितिमम्भसि तत्तेजस्यदो वायौ नभस्यमुम्॥ १६
khānyākāśe dravaṃ toye yathāsthānaṃ vibhāgaśaḥ|
kṣitimambhasi tattejasyado vāyau nabhasyamum|| 16
अर्थ
हृदयाकाशादि देहावच्छिन्न आकाशको महाकाशमें और शरीरगत रुधिरादि जलीय अंशको समष्टि जलमें लीन किया। इसी प्रकार फिर पृथ्वीको जलमें, जलको तेजमें, तेजको वायुमें और वायुको आकाशमें लीन किया॥ १६॥