श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.23.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

उत्सर्पयंस्तु तं मूर्ध्नि क्रमेणावेश्य निःस्पृहः।

वायुं१ वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत्॥ १५

utsarpayaṃstu taṃ mūrdhni krameṇāveśya niḥspṛhaḥ|

vāyuṃ vāyau kṣitau kāyaṃ tejastejasyayūyujat|| 15

अर्थ

फिर उसे और ऊपरकी ओर ले जाते हुए क्रमशः ब्रह्मरन्ध्रमें स्थिर किया। अब उन्हें किसी प्रकारके सांसारिक भोगोंकी लालसा नहीं रही। फिर यथास्थान विभाग करके प्राणवायुको समष्टि वायुमें, पार्थिव शरीरको पृथ्वीमें और शरीरके तेजको समष्टि तेजमें लीन कर दिया॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—वायौ वायुं।

    (मुद्रित पृष्ठ 521)

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