॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.23.17
इन्द्रियेषु मनस्तानि तन्मात्रेषु यथोद्भवम्।
भूतादिनामून्युत्कृष्य महत्यात्मनि सन्दधे॥ १७
indriyeṣu manastāni tanmātreṣu yathodbhavam|
bhūtādināmūnyutkṛṣya mahatyātmani sandadhe|| 17
अर्थ
तदनन्तर मनको [ सविकल्प ज्ञानमें जिनके अधीन वह रहता है, उन] इन्द्रियोंमें, इन्द्रियोंको उनके कारणरूप तन्मात्राओंमें और सूक्ष्मभूतों (तन्मात्राओं)-के कारण अहंकारके द्वारा आकाश, इन्द्रिय और तन्मात्राओंको उसी अहंकारमें लीन कर, अहंकारको महत्तत्त्वमें लीन किया॥ १७॥