॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.22.10
adhanā api te dhanyāḥ sādhavo gṛhamedhinaḥ|
yadgṛhā hyarhavaryāmbutṛṇabhūmīśvarāvarāḥ|| 10
अर्थ
जिनके घरोंमें आप-जैसे पूज्य पुरुष उनके जल, तृण, पृथ्वी, गृहस्वामी अथवा सेवकादि किसी अन्य पदार्थको स्वीकार कर लेते हैं, वे गृहस्थ धनहीन होनेपर भी धन्य हैं॥ १०॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—अधन्या।
- २
प्रा० पा०—श्वराश्चराः।