श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.11

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

व्यालालयद्रुमा वै३ तेऽप्यरिक्ताखिलसम्पदः।

यद‍्गृहास्तीर्थपादीयपादतीर्थविवर्जिताः॥ ११

vyālālayadrumā vai te'pyariktākhilasampadaḥ|

yadgṛhāstīrthapādīyapādatīrthavivarjitāḥ|| 11

अर्थ

जिन घरोंमें कभी भगवद्भक्तोंके परमपवित्र चरणोदकके छींटे नहीं पड़े, वे सब प्रकारकी ऋद्धि-सिद्धियोंसे भरे होनेपर भी ऐसे वृक्षोंके समान हैं कि जिनपर साँप रहते हैं॥ ११॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—द्रुमाश्चैते।

    (मुद्रित पृष्ठ 513)

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