श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.37

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

मा जातु तेजः प्रभवेन्महर्द्धिभि-

स्तितिक्षया तपसा विद्यया च।

देदीप्यमानेऽजितदेवतानां

कुले स्वयं राजकुलाद् द्विजानाम्॥ ३७

mā jātu tejaḥ prabhavenmaharddhibhi-

stitikṣayā tapasā vidyayā ca|

dedīpyamāne'jitadevatānāṃ

kule svayaṃ rājakulād dvijānām|| 37

अर्थ

सहनशीलता, तपस्या और ज्ञान इन विशिष्ट विभूतियोंके कारण वैष्णव और ब्राह्मणोंके वंश स्वभावतः ही उज्ज्वल होते हैं। उनपर राजकुलका तेज, धन, ऐश्‍वर्य आदि समृद्धियोंके कारण अपना प्रभाव न डाले॥ ३७॥

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