श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.36

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अहो ममामी वितरन्त्यनुग्रहं

हरिं गुरुं यज्ञभुजामधीश्‍वरम्।

स्वधर्मयोगेन यजन्ति मामका

निरन्तरं क्षोणितले दृढव्रताः॥ ३६

aho mamāmī vitarantyanugrahaṃ

hariṃ guruṃ yajñabhujāmadhīśvaram|

svadharmayogena yajanti māmakā

nirantaraṃ kṣoṇitale dṛḍhavratāḥ|| 36

अर्थ

अहो! इस पृथ्वीतलपर मेरे जो प्रजाजन यज्ञ-भोक्ताओंके अधीश्‍वर सर्वगुरु श्रीहरिका एकनिष्ठभावसे अपने-अपने धर्मोंके द्वारा निरन्तर पूजन करते हैं, वे मुझपर बड़ी कृपा करते हैं॥ ३६॥

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