श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.38

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो

नित्यं हरिर्यच्चरणाभिवन्दनात्।

अवाप लक्ष्मीमनपायिनीं यशो

जगत्पवित्रं च महत्तमाग्रणीः॥ ३८

brahmaṇyadevaḥ puruṣaḥ purātano

nityaṃ hariryaccaraṇābhivandanāt|

avāpa lakṣmīmanapāyinīṃ yaśo

jagatpavitraṃ ca mahattamāgraṇīḥ|| 38

अर्थ

ब्रह्मादि समस्त महापुरुषोंमें अग्रगण्य, ब्राह्मणभक्त, पुराणपुरुष श्रीहरिने भी निरन्तर इन्हींके चरणोंकी वन्दना करके अविचल लक्ष्मी और संसारको पवित्र करनेवाली कीर्ति प्राप्त की है॥ ३८॥

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