श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

यशः शिवं सुश्रव आर्यसंगमे

यदृच्छया चोपशृणोति ते सकृत्।

कथं गुणज्ञो विरमेद्विना७ पशुं

श्रीर्यत्प्रवव्रे गुणसंग्रहेच्छया॥ २६

yaśaḥ śivaṃ suśrava āryasaṃgame

yadṛcchayā copaśṛṇoti te sakṛt|

kathaṃ guṇajño viramedvinā paśuṃ

śrīryatpravavre guṇasaṃgrahecchayā|| 26

अर्थ

उत्तम कीर्तिवाले प्रभो! सत्संगमें आपके मंगलमय सुयशको दैववश एक बार भी सुन लेनेपर कोई पशुबुद्धि पुरुष भले ही तृप्त हो जाय; गुणग्राही उसे कैसे छोड़ सकता है? सब प्रकारके पुरुषार्थोंकी सिद्धिके लिये स्वयं लक्ष्मीजी भी आपके सुयशको सुनना चाहती हैं॥ २६॥✎ 1330

टिप्पणियाँ

  1. ७

    प्रा० पा०—विरमेदृते।

    (मुद्रित पृष्ठ 503)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1330 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): चरण-कमलोंका → चरणकमलोंका

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