श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

स उत्तमश्लोक महन्मुखच्युतो५

भवत्पदाम्भोजसुधाकणानिलः ।

स्मृतिं पुनर्विस्मृततत्त्ववर्त्मनां६

कुयोगिनां नो वितरत्यलं वरैः॥ २५

sa uttamaśloka mahanmukhacyuto

bhavatpadāmbhojasudhākaṇānilaḥ |

smṛtiṃ punarvismṛtatattvavartmanāṃ

kuyogināṃ no vitaratyalaṃ varaiḥ|| 25

अर्थ

पुण्यकीर्ति प्रभो! आपके चरणकमल-मकरन्दरूपी अमृत-कणोंको लेकर महापुरुषोंके मुखसे जो वायु निकलती है, उसीमें इतनी शक्ति होती है कि वह तत्त्वको भूले हुए हम कुयोगियोंको पुनः तत्त्वज्ञान करा देती है। अतएव हमें दूसरे वरोंकी कोई आवश्यकता नहीं है॥ २५॥✎ 1330

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा० पा०—मुखाच्च्युतो।

    (मुद्रित पृष्ठ 503)
  2. ६

    प्रा० पा०—कर्मणां।

    (मुद्रित पृष्ठ 503)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1330 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): चरण-कमलोंका → चरणकमलोंका

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