श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.36

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

एभिरिन्द्रोपसंसृष्टैः पाखण्डैर्हारिभिर्जनम्।

ह्रियमाणं विचक्ष्वैनं यस्ते यज्ञध्रुगश्‍वमुट्॥ ३६

ebhirindropasaṃsṛṣṭaiḥ pākhaṇḍairhāribhirjanam|

hriyamāṇaṃ vicakṣvainaṃ yaste yajñadhrugaśvamuṭ|| 36

अर्थ

जरा देखिये तो, जो इन्द्र घोड़ेको चुराकर आपके यज्ञमें विघ्न डाल रहा था, उसीके रचे हुए इन मनोहर पाखण्डोंकी ओर सारी जनता खिंचती चली जा रही है॥ ३६॥✎ 404

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #404 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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