बस, इस यज्ञको बंद कीजिये। इसीके कारण इन्द्रके चलाये हुए पाखण्डोंसे धर्मका नाश हो रहा है; क्योंकि देवताओंमें बड़ा दुराग्रह होता है॥ ३५॥✎ 404
क्रतुर्विरमतामेष देवेषु दुरवग्रहः।
धर्मव्यतिकरो यत्र पाखण्डैरिन्द्रनिर्मितैः॥ ३५
बस, इस यज्ञको बंद कीजिये। इसीके कारण इन्द्रके चलाये हुए पाखण्डोंसे धर्मका नाश हो रहा है; क्योंकि देवताओंमें बड़ा दुराग्रह होता है॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 499) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/19/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)