पृथुरूपसे सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने ही अवतार ग्रहण किया था; अतः पुण्यकीर्ति श्रीहरिके उस पृथु-अवतारसे सम्बन्ध रखनेवाले जो और भी पवित्र चरित्र हों, वे सभी आप मुझसे कहिये। मैं आपका और श्रीकृष्णचन्द्रका बड़ा अनुरक्त भक्त हूँ॥ ६-७॥✎ 1328
यह अर्थ श्लोक 6–7 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
भक्ताय मेऽनुरक्ताय तव चाधोक्षजस्य च।
वक्तुमर्हसि योऽदुह्यद्वैन्यरूपेण गामिमाम्॥ ७
पृथुरूपसे सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने ही अवतार ग्रहण किया था; अतः पुण्यकीर्ति श्रीहरिके उस पृथु-अवतारसे सम्बन्ध रखनेवाले जो और भी पवित्र चरित्र हों, वे सभी आप मुझसे कहिये। मैं आपका और श्रीकृष्णचन्द्रका बड़ा अनुरक्त भक्त हूँ॥ ६-७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 489) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/17/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1328 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): सनत्कुमार-जीसे → सनत्कुमारजीसे