श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

पृथुरुवाच

वसुधे त्वां वधिष्यामि मच्छासनपराङ्मुखीम्।

भागं बर्हिषि या वृङ्क्ते न तनोति च नो वसु॥ २२

vasudhe tvāṃ vadhiṣyāmi macchāsanaparāṅmukhīm|

bhāgaṃ barhiṣi yā vṛṅkte na tanoti ca no vasu|| 22

अर्थ

महाराज पृथुने कहा—पृथ्वी! तू मेरी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाली है। तू यज्ञमें देवतारूपसे भाग तो लेती है, किन्तु उसके बदलेमें हमें अन्‍न नहीं देती; इसलिये आज मैं तुझे मार डालूँगा॥ २२॥✎ 393 394 395 396 397 398 399

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (7)
  • #393 शब्दोंके बीचका स्थान: जोदुष्ट → जो दुष्ट
  • #394 शब्दोंके बीचका स्थान: गर्भसेनिकालती → गर्भसे निकालती
  • #395 शब्दोंके बीचका स्थान: कियेहुए → किये हुए
  • #396 शब्दोंके बीचका स्थान: करनेपरतुझे → करनेपर तुझे
  • #397 शब्दोंके बीचका स्थान: औरअपने → और अपने
  • #398 शब्दोंके बीचका स्थान: तूजो → तू जो
  • #399 शब्दोंके बीचका स्थान: भागतो → भाग तो

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