श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.23

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

यवसं जग्ध्यनुदिनं नैव दोग्ध्यौधसं पयः।

तस्यामेवं हि दुष्टायां दण्डो नात्र न शस्यते॥ २३

yavasaṃ jagdhyanudinaṃ naiva dogdhyaudhasaṃ payaḥ|

tasyāmevaṃ hi duṣṭāyāṃ daṇḍo nātra na śasyate|| 23

अर्थ

तू जो प्रतिदिन हरी-हरी घास खा जाती है और अपने थनका दूध नहीं देती—ऐसी दुष्टता करनेपर तुझे दण्ड देना अनुचित नहीं कहा जा सकता॥ २३॥✎ 393 394 395 396 397 398 399

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (7)
  • #393 शब्दोंके बीचका स्थान: जोदुष्ट → जो दुष्ट
  • #394 शब्दोंके बीचका स्थान: गर्भसेनिकालती → गर्भसे निकालती
  • #395 शब्दोंके बीचका स्थान: कियेहुए → किये हुए
  • #396 शब्दोंके बीचका स्थान: करनेपरतुझे → करनेपर तुझे
  • #397 शब्दोंके बीचका स्थान: औरअपने → और अपने
  • #398 शब्दोंके बीचका स्थान: तूजो → तू जो
  • #399 शब्दोंके बीचका स्थान: भागतो → भाग तो

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