मैं अत्यन्त दीन और निरपराध हूँ, आप मुझे क्यों मारना चाहते हैं? इसके सिवा आप तो धर्मज्ञ माने जाते हैं; फिर मुझ स्त्रीका वध आप कैसे कर सकेंगे?॥ १९॥✎ 1329
स त्वं जिघांससे कस्माद्दीनामकृतकिल्बिषाम्।
अहनिष्यत्कथं योषां धर्मज्ञ इति यो मतः॥ १९
मैं अत्यन्त दीन और निरपराध हूँ, आप मुझे क्यों मारना चाहते हैं? इसके सिवा आप तो धर्मज्ञ माने जाते हैं; फिर मुझ स्त्रीका वध आप कैसे कर सकेंगे?॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 490) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/17/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1329 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): शरणा-गतवत्सल → शरणागतवत्सल