श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

तामन्वधावत्तद्वैन्यः कुपितोऽत्यरुणेक्षणः।

शरं धनुषि संधाय यत्र यत्र पलायते॥ १५

tāmanvadhāvattadvainyaḥ kupito'tyaruṇekṣaṇaḥ|

śaraṃ dhanuṣi saṃdhāya yatra yatra palāyate|| 15

अर्थ

यह देखकर महाराज पृथुकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वे जहाँ-जहाँ पृथ्वी गयी, वहाँ-वहाँ धनुषपर बाण चढ़ाये उसके पीछे लगे रहे॥ १५॥✎ 1329

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1329 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): शरणा-गतवत्सल → शरणागतवत्सल

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें